यूपी सरकार ने परिषदीय विद्यालयों में संचालित होने वाली पीएम पोषण (मिड डे मील) योजना के संचालन में एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव किया

उत्तर प्रदेश सरकार ने परिषदीय विद्यालयों में संचालित होने वाली पीएम पोषण (मिड डे मील) योजना के संचालन में एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव किया है। नई व्यवस्था के तहत अब इस योजना से ग्राम प्रधानों की भूमिका पूरी तरह से समाप्त कर दी गई है।
इस फैसले के बाद अब मिड डे मील योजना से जुड़े बैंक खाते का संचालन विद्यालय प्रबंध समिति (वीएमसी) के अध्यक्ष और प्रधानाध्यापक संयुक्त रूप से मिलकर करेंगे।
अब कौन और कैसे करेगा मिड डे मील खाते का संचालन?
सामने आई नई व्यवस्था के अनुसार, विद्यालय प्रबंध समिति के अध्यक्ष-जो आमतौर पर किसी छात्र के अभिभावक होते हैं-और विद्यालय के प्रधानाध्यापक संयुक्त रूप से मिड डे मील खाते का संचालन संभालेंगे। बच्चों के लिए भोजन तैयार कराने के एवज में मिलने वाली सरकारी राशि का सदुपयोग और रसोइयों के मानदेय का भुगतान भी अब यही दोनों मिलकर करेंगे। आपको बता दें कि पहले यह जिम्मेदारी ग्राम प्रधान और प्रधानाध्यापक के संयुक्त हस्ताक्षर से निभाई जाती थी, लेकिन अब शासन ने इस पूरी व्यवस्था में बड़ा फेरबदल कर दिया है।
भोजन की गुणवत्ता और पारदर्शिता पर रहेगा सरकार का खास जोर
प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग का यह मानना है कि इस नई व्यवस्था के आ जाने से पीएम पोषण योजना के संचालन में पारदर्शिता काफी हद तक बढ़ेगी और बच्चों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता पर भी पहले से बेहतर निगरानी रखी जा सकेगी। पिछले कुछ समय में सरकार ने बच्चों को परोसे जाने वाले भोजन की नियमित जांच और उसकी मॉनिटरिंग के लिए कई कड़े कदम उठाए हैं। इसी कड़ी में पहले छात्रों की माताओं को भोजन की गुणवत्ता की जांच में शामिल किया गया था और अब खातों के संचालन की प्रक्रिया में भी यह बड़ा बदलाव कर दिया गया है।
सरकार के इस फैसले से ग्राम प्रधानों में गहरी नाराजगी
शासन के इस अचानक आए फैसले के बाद प्रदेशभर के ग्राम प्रधान संगठनों ने अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। उनका मुख्य रूप से यह कहना है कि जब तक पंचायत चुनाव संपन्न नहीं हो जाते, तब तक ग्राम प्रधानों को प्रशासक की जिम्मेदारी सौंपी गई है। ऐसे में सिर्फ मिड डे मील योजना के संचालन से उन्हें अलग करना बिल्कुल भी उचित नहीं है। प्रधानों का कड़ा तर्क है कि इस तरह के फैसलों से ग्राम पंचायतों की जमीनी भूमिका कमजोर होगी और स्थानीय स्तर पर आपसी समन्वय भी प्रभावित हो सकता है।
