सत्ता-स्वार्थ के चलते बनते-बिगड़ते राजनीतिक रिश्ते…….

राजनीति में रिश्ते बदलते देर नहीं लगती. ‘कोल्हान के टाइगर’ कहे जाने वाले चंपई सोरेन तीन जुलाई तक झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की सरकार के मुख्यमंत्री थे, फिर वापस मंत्री रह गए और अगस्त समाप्त होते-होते भाजपाई बन गए.चंपई के साथ आ जाने से भी झारखंड में कमल खिल पाएगा या नहीं, यह तो 2024 के आखिर में होनेवाले विधानसभा चुनावों के नतीजे ही बताएंगे, लेकिन फिर साबित हो गया कि नेताओं के लिए अपना स्वार्थ और सत्ता ही सर्वोपरि होती है. चंपई पुराने संघर्षशील नेता हैं, पर साल 2024 के आठ महीनों में झारखंड ही नहीं, देश ने उनके कई राजनीतिक रंग देख लिए.व्यक्ति केंद्रित क्षेत्रीय दलों में परिवार से बाहर किसी की ताजपोशी की कल्पना नहीं की जाती. फिर भी झामुमो के सर्वेसर्वा शिबू सोरेन के बेटे हेमंत सोरेन ने इसी साल जनवरी के आखिरी दिन मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर चंपई सोरेन को झारखंड का नया मुख्यमंत्री बनवाया.

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