मोदी ने थामा हाथ, CJP से भी जाकर कर ली बात

महाराष्ट्र और देश की राजनीति में जब भी अनिश्चितता के बादल छाते हैं तो सबसे पहला ध्यान मराठा क्षत्रप शरद पवार पर ही जाकर टिकता है। भारतीय राजनीति में शरद पवार को सस्पेंस और असमंजस की राजनीति का सबसे माहिर खिलाड़ी माना जाता है।

संसद सत्र में मोदी सरकार द्वारा परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) लाए जाने की चर्चाएं जोरों पर हैं। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या शरद पवार की पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) यानी NCP(SP) इस विधेयक पर सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का साथ देगी?

एक तरफ जहां देश के सियासी गलियारों में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं, वहीं दिग्गज नेता शरद पवार ने अपने अंदाज के मुताबिक पूरी तरह से खामोशी साध रखी है। उनके इस मौन और परस्पर विरोधी कदमों ने सहयोगियों और विरोधियों दोनों को गहरी उलझन में डाल दिया है।

दो राहों पर एक साथ कदम

शरद पवार के हाल के कदमों पर नजर डालें तो उनकी रणनीतिक अस्पष्टता साफ दिखाई देती है। एक तरफ जहां मंगलवार को वह दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट (NEET) पेपर लीक मामले को लेकर प्रदर्शन कर रहे छात्रों के बीच पहुंचे और विपक्षी नेताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग करते दिखे, तो वहीं इसके ठीक अगले ही दिन बुधवार को वह अपनी बेटी और बारामती से सांसद सुप्रिया सुले के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करते नजर आए।

यह कोई पहला मौका नहीं है जब उन्होंने इस तरह के विपरीत संकेत दिए हों। कुछ ही दिनों पहले खबर आई थी कि पवार की पार्टी के अन्य दलों द्वारा संभावित तोड़फोड़ से बचने के लिए कांग्रेस में विलय पर विचार किया जा रहा है। लेकिन उसके तुरंत बाद ही यह अटकलें तेज हो गईं कि अपनी पार्टी का भविष्य सुरक्षित करने के लिए पवार का झुकाव एनडीए की ओर हो सकता है।

डीलिमिटेशन बिल पर रहस्य

संसद में संभावित परिसीमन विधेयक पर पवार गुट क्या रुख अपनाएगा, इसको लेकर अभी स्थिति साफ नहीं है। सुप्रिया सुले हालांकि एनडीए में शामिल होने या उनके किसी प्रस्ताव का समर्थन करने की खबरों का लगातार खंडन कर रही हैं, लेकिन विधेयक को लेकर दिए गए उनके हालिया बयान ने इस चर्चा को और हवा दे दी है। सुप्रिया सुले ने कहा था कि यदि प्रस्तावित परिसीमन विधेयक देश के सभी राज्यों में सीटों की संख्या में 50 प्रतिशत की समान वृद्धि पर आधारित होता है तो इसका विरोध करने का कोई जायज कारण नहीं बनता। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पार्टी ने आधिकारिक तौर पर अभी तक कोई रुख तय नहीं किया है लेकिन उनके इस नरम बयान ने राजनीतिक पंडितों के कान खड़े कर दिए हैं।

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