जयशंकर ने पहली बार खोला ईरान के साथ हुई डील का राज

ईरान और इजरायल के बीच छिड़ी जंग ने पूरी दुनिया में ईंधन की सप्लाई को लेकर हाहाकार मचा रखा है। समंदर के सबसे खतरनाक रास्ते ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) में दुनिया भर के तेल और गैस के जहाज फंसे हुए हैं।
लेकिन इस तनाव के बीच भारत के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर आई है। ईरान ने अपनी पुरानी दोस्ती निभाते हुए भारतीय झंडे वाले जहाजों को सुरक्षित रास्ता दे दिया है।
अब सवाल उठ रहा है कि जहाँ ईरान अन्य जहाजों को निशाना बना रहा है, वहीं भारत के ये जहाज ‘मौत के रास्ते’ को पार कैसे कर गए? खुद विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इसके पीछे की ‘इनसाइड स्टोरी’ बताई है।
‘शिवालिक’ और ‘नंदा देवी’ लेकर आ रहे भारी राहत
भारत के दो विशाल गैस टैंकर, ‘शिवालिक’ और ‘नंदा देवी’, करीब 92,700 मीट्रिक टन एलपीजी (LPG) लेकर भारत के तट पर पहुंचने वाले हैं। जानकारी के मुताबिक, ‘शिवालिक’ आज ही मुंद्रा बंदरगाह पर लंगर डालेगा, जबकि ‘नंदा देवी’ कल कांडला बंदरगाह पर पहुंचेगा। इन जहाजों का सुरक्षित निकलना भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है, क्योंकि होर्मुज ही वह रास्ता है जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है।
विदेश मंत्री जयशंकर ने बताया ‘पर्दे के पीछे का खेल’
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने खुलासा किया कि यह सफलता रातों-रात नहीं मिली, बल्कि यह तेहरान के साथ लगातार चल रही सीधी बातचीत का नतीजा है। उन्होंने बताया कि होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही शुरू करने के लिए भारत ने तर्क और आपसी तालमेल का रास्ता चुना। जयशंकर ने साफ किया कि भारत के लिए कोई एकमुश्त या ‘ब्लैंकेट अरेंजमेंट’ (Blanket Arrangement) नहीं है, बल्कि हर जहाज की आवाजाही पर अलग से चर्चा की जा रही है। उन्होंने कहा, “मैं इस समय उनसे बातचीत में लगा हुआ हूं और मेरी बातचीत से नतीजे मिल रहे हैं।”
क्या ईरान ने बदले में कुछ मांगा?
जब जयशंकर से पूछा गया कि क्या भारत ने इस रास्ते के बदले ईरान को कुछ दिया है, तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि यह कोई ‘लेन-देन’ का मामला नहीं है। दिल्ली और तेहरान के बीच आपसी संबंधों का एक लंबा इतिहास रहा है और इसी आधार पर बातचीत की गई। उन्होंने इस संघर्ष को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि अभी कई और भारतीय जहाज वहां मौजूद हैं, इसलिए बातचीत का सिलसिला थमा नहीं है।
मोदी की कॉल और जयशंकर की कूटनीति का असर
इस पूरे मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका भी बेहद अहम रही। ‘शिवालिक’ और ‘नंदा देवी’ को रास्ता मिलने से पहले पीएम मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से फोन पर लंबी चर्चा की थी। इस दौरान ऊर्जा की आवाजाही (Transit) और क्षेत्रीय शांति पर विस्तार से बात हुई थी। इसी फोन कॉल के बाद तेहरान का रुख भारत के प्रति नरम हुआ। जयशंकर ने इसे एक ‘स्वागत योग्य कदम’ बताया है, जो दिखाता है कि वैश्विक संकट के समय भी भारत की कूटनीति अपना लोहा मनवा रही है।
