मंदिरों से चोरी की गई 3 मूर्तियां भारत को लौटाएगा अमेरिका

अमेरिका के वाशिंगटन डीसी स्थित प्रसिद्ध स्मिथसोनियन नेशनल म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट ने भारत की सांस्कृतिक विरासत को लेकर एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है। म्यूजियम ने बीते बुधवार को घोषणा की कि वह तमिलनाडु के मंदिरों से अवैध रूप से निकाली गई तीन प्राचीन कांस्य मूर्तियों को भारत सरकार को वापस करेगा।
इन मूर्तियों की वापसी के पीछे वर्षों की गहन जांच और साक्ष्यों का हाथ है। वाशिंगटन के इस प्रमुख संग्रहालय ने स्वीकार किया है कि उसके संग्रह में मौजूद तीन मूर्तियां दशकों पहले दक्षिण भारत के मंदिरों से चोरी कर अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेची गई थीं। इन मूर्तियों की पहचान और उनके मूल स्थान की पुष्टि ‘फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पांडिचेरी’ के फोटो अभिलेखागार की मदद से की गई है।
वापस की जाने वाली तीनों मूर्तियां दक्षिण भारतीय कांस्य शिल्प कला के उत्कृष्ट नमूने हैं। चोल काल की शिव नटराज मूर्ति तंजानूर के तिरुथुराईपुंडी स्थित श्री भव औषधीश्वर मंदिर से चोरी की गई थी। यह लगभग 990 ई. की है। ऐसी ही सोमस्कंद है जो कि 12वीं शताब्दी के चोल काल की है। यह मन्नारगुड़ी स्थित अलत्तूर के विश्वनाथ मंदिर से चोरी की गई थी। संत सुंदरर और परवई कल्लाकुरिची के वीरसोलापुरम स्थित शिव मंदिर की है। यह 16वीं शताब्दी के विजयनागर काल की मूर्ति है।
म्यूजियम की जांच में सामने आया कि शिव नटराज की मूर्ति को 2002 में न्यूयॉर्क की एक गैलरी से खरीदा गया था, जिसने बिक्री के लिए फर्जी दस्तावेज पेश किए थे। वहीं अन्य दो मूर्तियां 1987 में एक उपहार के रूप में म्यूजियम को मिली थीं। शोधकर्ताओं ने पाया कि इन मूर्तियों की तस्वीरें 1956 से 1959 के बीच तमिलनाडु के मंदिरों में खींची गई थीं, जो इस बात का पुख्ता कानूनी सबूत बना कि इन्हें अवैध रूप से वहां से हटाया गया था।
भारत सरकार और म्यूजियम के बीच एक विशेष समझौता हुआ है। इसके तहत ‘शिव नटराज’ की मूर्ति को भारत को सौंपने के बाद भारत सरकार इसे लॉन्ग-टर्म लोन (दीर्घकालिक ऋण) पर वापस म्यूजियम को देगा।
इससे म्यूजियम इस मूर्ति को अपनी प्रदर्शनी “द आर्ट ऑफ नोइंग” में प्रदर्शित कर सकेगा, लेकिन अब इसके साथ इसकी चोरी होने और वापस भारत को सौंपे जाने की पूरी ‘सच्ची कहानी’ भी प्रदर्शित की जाएगी।
म्यूजियम के निदेशक चेस रॉबिन्सन ने कहा कि यह निर्णय सांस्कृतिक विरासत के प्रति हमारी जिम्मेदारी और पारदर्शिता को दर्शाता है। उन्होंने इस प्रक्रिया में सहयोग के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और भारत सरकार का आभार व्यक्त किया।
