वंदे मातरम पर बे बुनियाद विवाद ।
वंदे मातरम पर बे बुनियाद विवाद ।

वंदे मातरम 1875 में बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित गाना है जिसे परतंत्र भारत में स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा देश एवं विदेश दोनों में गया गया। 1857 में जो आंदोलन होने के बाद स्वतंत्रता आंदोलन कुछ ठंडा हो गई थी, इस गाने के आने के बाद पूरे देश के स्वतंत्रता सेनानियों में नया जोश भर दिया जब यह गाना बना तो उसे किसी भी धर्म के लोग बड़ी शान से गाते थे चाहे वह किसी भी धर्म के हो वह इसे गाते_गाते फांसी पर भी चढ़ गए जिसमें भगत सिंह ,अशफाक उल्ला खान की तरह से हजारों स्वतंत्रता सेनानी अपने देश के स्वतंत्रता के लिए बलिदान हों गये। वर्तमान में भारतीय सेना हर युद्ध में इसी नारे को लगती है। अतः इस गाने को हमारे कुछ राजनेता या देश के कुछ लोग धर्म के नाम पर नहीं बोलना चाहते हैं तो वह इस देश के लिए गद्दार है ,उन्हें इस देश में रहने के लिए अधिकार देना गलत है, ऐसे लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए। इस गाने की जो पंक्तियां
हटाई गई है उन्हें भी जोड़ देनी चाहिए क्योंकि तुष्टीकरण को ध्यान में रखकर वह पत्तियां हटाई गई थी। धर्म के आधार पर देश का बंटवारा होने के बाद वह जोड़ने योग्य हो गई है सरकार इस पर चर्चा के साथ ही ईन पक्षियों को भी इस गाने में जोड़ने का कार्य करना चाहिए।
डॉक्टर एम ठाकुर
