तेजस्वी यादव की RJD रह गई आधी, बिहार चुनाव में दुर्गति के लालू समेत 5 बड़े फैक्टर

बिहार विधानसभा चुनाव में वापसी की उम्मीद लगाए और शपथ तक की तारीख बताते घूम रहे तेजस्वी यादव को करारा झटका लगा है। अब तक के रुझानों में आरजेडी सिर्फ 33 सीटों पर ही आगे है, जो कि 2020 के मुकाबले आधे से भी कम है।

तब आरजेडी को 78 सीटों पर जीत मिली थी और वह राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। लेकिन इस बार चीजें एकदम बदल चुकी हैं। चुनाव आयोग के मुताबिक अब तक जेडीयू 83 सीटों पर आगे चल रही है, जबकि भाजपा 80 सीटों पर बढ़त बनाए हुए हैं। एनडीए की ही साथी लोजपा-आर के खाते में 22 सीटें जाती दिख रही हैं। इसके अलावा जीतनराम मांझी की HAM भी 4 सीटों पर आगे है।

इस तरह एनडीए तो 200 पार की ओर बढ़ रहा है, लेकिन महागठबंधन कुल मिलाकर भी 50 सीट पाते नहीं दिख रहे हैं। यदि ये रुझान नतीजों में बदले तो आरजेडी के लिए यह चुनाव 2010 जैसे होगा, तब जेडीयू की लहर चली थी और आरजेडी महज 22 पर रुक गई थी। इस लिहाज से देखें तो तेजस्वी यादव के राजनीतिक करियर के लिए यह करारा झटका है। इसके अलावा राहुल गांधी भी इस चुनाव में झटका खाते दिख रहे हैं। उन्होंने कैंपेन को लीड किया था और उसके बाद भी कांग्रेस को 5 सीटें ही मिलना बड़ा झटका है। यहां कांग्रेस ने 62 सीटों पर चुनाव लड़ा था। आरजेडी के इस हाल के लिए 5 फैक्टर जिम्मेदार मान रहे हैं…

लालू की चुनाव प्रचार से दूरी

बिहार विधानसभा चुनाव में लालू यादव बैकएंड पर ही काम करते दिखे, लेकिन प्रचार से दूर नजर आए। इस बार लालू फैक्टर ने दो तरह से काम किया और दोनों ही तरीके आरजेडी के लिए नुकसानदायक रहे। एक तरफ लालू बाहर नहीं निकले तो समर्थक निराश हो गए। वहीं विरोधी तो जंगलराज का जिक्र करके लालू फैक्टर की बात कर ही रहे थे और उसने भी आरजेडी को नुकसान पहुंचाया।

परिवार में कलह और विरोधियों की फतह

तेज प्रताप यादव इस चुनाव में अलग दल बनाकर उतरे थे। वह खुद तो हारे ही हैं, कई जगहों पर आरजेडी को भी नुकसान पहुंचाया। तेज प्रताप के रुख से सबसे बड़ा नुकसान आरजेडी के नैरेटिव को लेकर हुआ है। परिवार की कलह ने आरजेडी को ऐसे ही नुकसान पहुंचाया, जैसे सपा को यूपी में 2017 में झटका लगा था।

नीतीश और मोदी की जुगलबंदी

एनडीए ने शुरुआती समय से ही समन्वय बेहतर रखा। सीटों का स्पष्ट बंटवारा हुआ और समय पर ही कैंपेन तेज हो गया। इसके अलावा नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी जब मंच पर एक साथ नजर आए तो वोटरों में भरोसा पैदा हुआ। वहीं महागठबंधन तो बिखरा ही दिखा और प्रचार में भी लोग अलग-अलग नजर आए।

वादों की जगह हासिल पर यकीन

तेजस्वी यादव ने इस चुनाव में हर परिवार में एक सरकारी नौकरी देने का वादा किया था। इसके अलावा भी कई बड़े वादे किए गए थे। लेकिन इन वादों पर नीतीश कुमार की 10 हजार रुपये देने की स्कीम भारी पड़ी।

सीट बंटवारे में विवाद

महागठबंधन के बीच सीटों का विवाद तो आखिरी तक नहीं सुलझा। करीब एक दर्जन ऐसी सीटें थीं, जहां फ्रेंडली फाइट की बात हुई। अंत में ये चीजें भारी पड़ीं।

Above Reporter Photo
[embedyt] https://www.youtube.com/embed?listType=playlist&list=UCYzEYpxh613jPw3luW3xiQA&layout=gallery[/embedyt]