पटना हाई कोर्ट ने नीतीश सरकार को दिया झटका, बिहार में 75 प्रतिशत आरक्षण रद्द

बीते आम चुनाव में आरक्षण का मुद्दा गरमाया हुआ था। ऐसा भी माना जाता है कि केंद्र में सत्ताधारी पार्टी की चुनाव में कम सीटों की वजह नेताओं द्वारा आरक्षण पर दिए गए भाषण है।इस दौरान पटना हाईकोर्ट ने गुरुवार आरक्षण को लेकर एक फैसला दिया है। इसमें बिहार में सरकारी नौकरी और उच्च शैक्षणिक संस्थानों में एडमिशन के लिए 65 प्रतिशत करने वाले बिहार आरक्षण को समानता विरोधी बताकर अदालत ने रद्द कर दिया है। बता दें कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की महागठबंधन वाली सरकार ने जाति आधारित सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार ईबीसी, ओबीसी, दलित और आदिवासियों का आरक्षण बढ़ाकर 65 प्रतिशत कर दिया था। साथ ही पिछड़े वर्ग लोगों को मिलने वाले 10 प्रतीशत आरक्षण को मिलाकर बिहार में नौकरी और दाखिले का कोटा बढ़ाकर 75 परसेंट पर पहुंच गया था।
बिहार में बढ़ते आरक्षण को देखते हुए कई संगठनों ने पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। इस मामले में गौरव कुमार व अन्य के दायर याचिका में पटना हाई कोर्ट ने सुनवाई की. हाई कोर्ट ने सुनवाई कर फैसला 11 मार्च 2024 को सुरक्षित रख लिया था, जिसे आज सुनाया गया. चीफ जस्टिस के वी चंद्रन की खंडपीठ गौरव कुमार व अन्य याचिकाओं पर लंबी बहस हुई थी.
राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता पीके शाही ने बहस की. उन्होंने कोर्ट को बताया था कि राज्य सरकार ने ये आरक्षण इन वर्गों के पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं होने के कारण दिया था. राज्य सरकार ने ये आरक्षण अनुपातिक आधार पर नहीं दिया था। बिहार सरकार ने आरक्षण संशोधन बिल के जरिए आरक्षण दायरा बढ़ा 65 फीसदी कर दिया था। 10 प्रतिशत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को मिलने वाले आरक्षण को जोड़ दें जो कुल 75 फीसदी आरक्षण का लाभ मिलेगा। 21 नवंबर 2023 को बिहार सरकार ने इसको लेकर गजट प्रकाशित कर दिया था। इसके बाद से शिक्षण संस्थानों और नौकरी में अनुसूचित जाति/जनजाति, पिछड़ा वर्ग और अति पिछड़ों को 65 फीसदी आरक्षण का लाभ मिल रहा था।
